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नेप्च्यून -हीरों की बारिश (omg)


   नेप्च्यून - हम सभी लोग ये जानते हैं कि हमारे सौरमंडल में जितने भी ग्रह उपस्थित है वो सभी अपने आप में वहुत से अजीब गुणों को रखते हैं जैसे कि हम जानते हैं कि हमारी पृथ्वी पर पानी की बारिश होती है उसही प्रकार दूसरे ग्रहों पर भी बारिश होती है पर यह जरूरी नही की वो बारिश पानी की ही हो जी हाँ हमारे सौरमंडल में दो ऐसे भी ग्रह उपस्थित हैं जिनपर पानी नहीं बल्कि हीरों की बारिश होती है और वो दोनों ग्रह हैं- नेप्च्यून और यूरेनस ।   



ये दोनों हमारे सौरमंडल में उपस्थित एक मात्र ऐसे ग्रह हैं जिन पर हीरों की बारिश होती है पर आप अब ये सोचते होंगे कि हम वहाँ जाकर हीरे ले क्यों नही आते तो इसका उत्तर यह है कि क्योंकि वहाँ हमेशा हीरे वरसते रहते हैं जिस कारण हम वहाँ नही जा सकते। इसके अलावा एक सवाल और यह भी है कि ऐसा वहाँ क्यों होता है तो इसका भी एक बैज्ञानिक कारण है जो निम्न प्रकार प्रस्तुत है।
वैज्ञानिकों ने कहा है कि यूरेनस और नेप्ट्यून में पानी नहीं, बहुमूल्य रत्न हीरे की बारिश होती है और ऐसा हाल ही पिछले कुछ दिनों में वहां हो रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दोनों ही ग्रहों के अंदरूनी भागों में एट्मॉस्फियरिक प्रेशर बहुत ज्यादा होता है, जिसकी वजह से हाइड्रोजन और कार्बन के बॉन्ड टूट जाते हैं।
यही वजह है कि इन ग्रहों पर हीरों की बारिश होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले हजार सालों से ये हीरे धीरे-धीरे इन प्लेनेट्स की बर्फीली सतह पर जमा हरे रहे हैं। आपको बता दें कि इन दोनों ही ग्रहों की संरचना पृथ्वी से बहुत अलग है। इन ग्रहों पर हाइड्रोजन और हीलियम जैसी गैसों का दबदबा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन ग्रहों के भीतरी भाग से लगभग ६२०० मील अंदर अत्याधिक दबाव होता है। यही वजह है कि इन ग्रहों पर हीरों की बारिश होती है।
दरअसल हमारे एनवायर्नमेंट में एटमॉस्फियरिक प्रेशर होता है। इसके जरिए वॉटर वेपर्स का कंडेन्सेशन होता है और इसी तरह आसमान में बादल बारिश और ओले बनकर धरती पर गिरते हैं। नेप्ट्यून और यूरेनस के एटमॉस्फियर में मिथेन है और उसे प्रेशराइज्ड करने पर हाइड्रोजन अलग हो जाता है और कार्बन डायमंड यानी कि हीरे की शक्ल ले लेता है।
आइये अब हम इन दोनों ग्रहों के बारे में कुछ और भी जान लेते हैं।
हमारे सौर मण्डल में चार ग्रहों को गैस दानव कहा जाता है, क्योंकि इनमें मिटटी-पत्थर की बजाय अधिकतर गैस है और इनका आकार बहुत ही विशाल है। वरुण इनमे से एक है - बाकी तीन बृहस्पतिशनि और अरुण (युरेनस) हैं। इनमें से अरुण की बनावट वरुण से बहुत मिलती-जुलती है। अरुण और वरुण के वातावरण में बृहस्पति और शनि के तुलना में बर्फ़ अधिक है - पानी की बर्फ़ के अतिरिक्त इनमें जमी हुई  अमोनिया और मेथेन गैसोंकी बर्फ़ भी है। इसलिए कभी-कभी खगोलशास्त्री इन दोनों को "बर्फ़ीले गैस दानव" नाम की श्रेणी में डाल देते हैं।
जहाँ अरुण ग्रह सिर्फ एक गोले का रूप दिखता है जिसपर कोई निशान या धब्बे नहीं हैं, वहाँ वरुण पर बादल, तूफ़ान और मौसम का बदलाव साफ़ नज़र आता है। माना जाता है के वरुण पर तूफ़ानी हवा सौर मण्डल के किसी भी ग्रह से ज़्यादा तेज़ चलती है और 2100 किमी प्रति घंटा तक की गतियाँ देखी जा चुकी हैं। जब 1981 में वॉयेजर द्विती यान वरुण के पास से गुज़रा तो वरुण पर एक "बड़ा गाढ़ा धब्बा" नज़र आ रहा था, जिसकी तुलना बृहस्पति के "बड़े लाल धब्बे" से की गयी है। क्योंकि वरुण सूरज से इतना दूर है, इसलिए उसका ऊपरी वायुमंडल बहुत ही ठंडा है और वहाँ का तापमान -128℃ (55 केल्विन) तक गिर सकता है। इसके बड़े अकार की वजह से इस ग्रह के केंद्र में इसके गुरुत्वाकर्षण के भयंकर दबाव से तापमान 5000℃ तक पहुँच जाता है। वरुण के इर्द-गिर्द कुछ छितरे-से  ऊपरी छल्ले भी हैं जिन्हें वॉयेजर द्वितीय ने देखा था। वरुण का हल्का नीला रंग अपने ऊपरी वातावरण में मौजूद मीथेन गैस से आता है।

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